06
Jul
10

भारत बँध

कल भारत बँध था| महँगाई के खिलाफ विपक्षी दलों का प्रदर्शन| वो महँगाई जो हमारे नेताओं को व्यक्तिगत रूप से कभी भी महसूस नहीं होती, असर नही होता, फ़र्क नहीं पड़ता – चाहे फिर वो कॉंग्रेसी हों, भाजप के हों या कोई और अन्य पार्टी|

कल, ५ जुलाई २०१० को भारत बँध था| हमारे देश में बढ़ती हुई महँगाई से भी ज़्यादा बढ़ती मानसिक नपुंसकता का एक भव्य प्रदर्शन था|
कल, भारत बँध था! अनुमानित ६००० करोड़ रुपयों से ज़्यादा का नुकसान हुआ| हज़ारो की संख्या में लोग परेशन हुए, गाड़ियाँ रोकी गईं, यातायात ठप्प हुआ, मार-पीट, पत्थरबाज़ी| आपातकालीन वाहनों को रोका| दूर-दराज से आए हुए मजबूर मज़दूरों को चाय तक न मिली| यह मेरा भारत महान था|
इन सबसे महँगाई रुकेगी? क्या वास्तव में ऐसे प्रदर्शनो और गुंडागर्दी से महँगाई काबू में आएगी? किसी नेता ने कभी यह सोचा कि वह आम आदमी से पूछे कि तुमको भारत बँध चाहिए? पर हमारे नेता आम आदमी की कब सुनते हैं? और कुन्द होते हुए आम आदमी को भी ज़ल्द ही विरासत में सिर्फ़ मानसिक नपुंसकता ही प्राप्‍त होगी – वह भी किसी नेता को पैसा देकर!
हम बदलाव चाहते हैं पर प्रयत्न यही रहेगा कि हमारी ज़िंदगी को बेहतर बनाने वाला कोई दूसरा ही हो| हम तो आराम से बैठे रहें; पैसा आता रहे; रोटी मिलती रहे; टीवी पर दूसरों की ज़िंदगियाँ निर्वस्त्र होती रहें – देश अपने आप उन्नति की तरफ कदम बढ़ाता रहेगा. व्यक्तिगत रूप से कोई परेशानी हो तो किसी के चाय-पानी का बंदोबस्त हो ही जाएगा| बहुत तकलीफ़ हुई तो कोई ‘कॅन्नेकशन’ तो निकल ही आएगा| और फिर अंततः बँध का जुगाड़ तो हो ही जाएगा!
मेरी निगाह में इस प्रकार के ‘चक्का-जाम’ प्रदर्शन, तोड़-फोड़ की नियति, भारत बँध के राजनैतिक हथकंडे – चाहे कोई भी पार्टी करे – संगीन जुर्म है|
कल भारत बँध था…सड़क पर फँसी हुई एक अस्पताल की गाड़ी में से दर्द की चीखें धीरे-धीरे, इस बँध में बंद हो गयीं| जो सुनाई पड़ रहा था, वो था डंडों और इटों से लैस गुण्डों का वहशी चिल्लाना; लोगो को मार-मार के भगाना और अपनी पार्टियों के झंडे लहराना|
(१)
आज सारे कोदंडधारी राम, सबके सब,
स्वर्णमृगों के पीछे गये, और लौटे नहीं,
सारे के सारे लक्ष्मण रावण से मिल
गये, और रेखा खींची नहीं|
सारे जटायु सीताओं की रक्षा में,
अनगिनत रावणों के हाथों
शहीद हो गये कट-कट कर ध्वस्त हो गये|
शेष रह गये हैं अब
बेशुमार संपाति
जो सूर्य के ओर, चार वर्षों में
केवल, चार कदम चल पाए, और
सत्य पर लगे स्वर्ण के ढक्कन से
अभिभूत होकर, उसी से चिपक गये,
फिर उन्होंने अपने चमचों से
अपनी चार-कदमी उड़ान के गीत गवाए|
(२)
आज पांडव स्वयं
अपनी द्रौपदी को नग्न करने में
व्यस्त हैं और कौरवों के साथ मिल कर
हंस हंस कर मज़ा लेने में मस्त हैं,
अंधे धृतराष्ट्रों के
अनगिनीत सपूत और
उनके क्लीव भाई पांडु के
कपूत, रखवाले कृष्ण के मार्गों को रोके बैठे हैं|
अत: अब,
सारी द्रौपदीयों को नंगा नाचना है|
तथा सब अपमानित सीताओं को,
भूमिगत होना है|
(३)
सारे असहाए रामों को
आत्म हत्या करनी है
सभी हताश कृष्ण
लोलुप बहलियों के हाथ
हत्या होनी है|
आज नृसिँह, हीरण्यकशिपों
को पाल रहे हैं, और
प्रहलादों के पेट चीर रहे हैं|
इसलिए भाइयों,
आपको, बार बार, ज़ोर से
बोलना है:
मेरा भारत महान्
एक वर्ष में, मात्र एक पग
चलने वाला, मेरा भारत महान
क्योंकि समता का युग है,
गधे और घोड़े सब हैं समान
गधे चरेंगे अंगूर और घोड़ों पर
सवारी करेंगे काले मुँह के लंगूर|
(डॉ. रमेश कुमार शर्मा)
मेरे भारत के नपुंसक शासकों, अब बंद करो ये बँध!


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