Archive for April, 2016

18
Apr
16

एक हक़ीकत यह भी!

“मैं हँसी के जाम में, ज़िंदगी का ज़हर पीता हूँ,
फेंक कर पतवार को हाथों से नाव खेता हूँ.”
“मैं क्या हूँ? कहाँ का हूँ? कैसे बताऊँ?
मैं – एक वह हूँ, जो मैं समझता हूँ मैं हूँ
एक वह हूँ, जो दूसरे समझते हैं मैं हूँ
असली मैं, इन दोनो बीच कुछ हूँ.”
– कुछ पंक्तियाँ कविता संग्रह ‘क्षण घूँघरू’ से (लेखक: स्वर्गिय प्रोफेसर रमेश कुमार शर्मा)

जिंदगी की ‘जेब में
इक छेद क्या हुआ,
सिक्कों से ज़्यादा
रिश्ते सरक गये.’

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