18
Apr
16

एक हक़ीकत यह भी!

“मैं हँसी के जाम में, ज़िंदगी का ज़हर पीता हूँ,
फेंक कर पतवार को हाथों से नाव खेता हूँ.”
“मैं क्या हूँ? कहाँ का हूँ? कैसे बताऊँ?
मैं – एक वह हूँ, जो मैं समझता हूँ मैं हूँ
एक वह हूँ, जो दूसरे समझते हैं मैं हूँ
असली मैं, इन दोनो बीच कुछ हूँ.”
– कुछ पंक्तियाँ कविता संग्रह ‘क्षण घूँघरू’ से (लेखक: स्वर्गिय प्रोफेसर रमेश कुमार शर्मा)

जिंदगी की ‘जेब में
इक छेद क्या हुआ,
सिक्कों से ज़्यादा
रिश्ते सरक गये.’

धूल से लिपटी
यादों की तस्वीरों में,
अब हम एक कार्टून
ही बन कर रह गये.

जज़्बातों के तहख़ाने में
उसूलों की रूह कब तलक मर चुकी,
पर चिन्दियो को
उधेड़ने की लत हमारे
हमनवाओं को लगी रही.

नकेल लगा के बाँध दिया
ज़िम्मेदारी के कोल्हू पर,
कमर जब टूटी
तो अंकुशों से खड़ा
किया संवार कर.

हड्डियों को बेच कर
चमड़ी में भूसा भर दिया,
तू शान है घर की
कह कर
चौखट पर नज़राना बना दिया.

तमन्नाओ का कत्ल खुलेआम
बेख़टक बेझिझक दर रोज हुआ,
हर मौत को खानदानी
कफ्न से सजा दिया.

आखरी साँस तक समझने
और समझाने की कोशिश में,
हम कलेजे को खुद
दस्तरख़्वान में पेश कर आए.

सिले होठों से
अपनो की महफ़िल में,
हम खामोश तूफ़ानों के अलफाज़ लिए
दास्ताने-ग़म सुनाते रहे;
माथे पर कब सिरफिरा दाग दिया
हम रोशनी में चिराग खोजते रहे.

अब इस सन्नाटे में
आह से भी डर लगता है,
ज़ख़्म पर मरहम लगाने के
बहाने कोई नमक ना
छिड़क जाए.


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