07
Jan
17

न जाने क्यों?

ख्वाबों के दरिया में
अचनाक
ताबीर आया, और
ज़ंक़े-जंगों से सजे
मेरी यादों के ताबूत में
एक दरार
नई
पड़ गयी.

न जाने क्यों
आज तुम
बहुत याद आए?

आँखों में कुछ चुभा
इसलिए
दारियाए-पानी को
जब
आँसुओं से धो कर साफ किया,
तो तपती पलकों से
इक सिसकती हुई
पुरानी तस्वीर
टपक पड़ी.

न जाने क्यों
आज तुम
बहुत याद आए?

अर्से पहले की
लाल धब्बेदार तस्वीर में
तुम दिखाई तो पड़े,
पर
चेहरा नज़र न आया.

न जाने क्यों
आज तुम
बहुत याद आए?

बुझती हुई,
भीगी
शमा की रोशनी
में,
सिहरते हाथों का
मुसव्विर साया
ज़हन में आया.

न जाने क्यों
आज तुम
बहुत याद आए?

साये के पीछे
बिन क़ब्ज़ों वाली खिड़की
से
तुम्हारे लबों के
ऊपर का तिल
ज़ुबाँ पर आया.

तुम,
आज फिर
न जाने क्यों,
बहुत याद आए!

पुरानी यादें
ताज़ा हुईं ताहज़ी,
जख्म तो
हमेशा हरा-भरा ही रहा;
धुएँ से सराबोर
तुम्हारी खुली आँखें
मालुम है मुझसे क्या
कह रहीं हैं,
इसलिए जानते हुए भी
फिर
न जाने क्यों,
तुम
आज,
बहुत याद आए.

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1 Response to “न जाने क्यों?”


  1. 1 Nidhi
    January 7, 2017 at 4:08 pm

    What a beautiful heartfelt poem!

    Sent from my iPhone

    >


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