21
Jun
17

इसलिए

दिमाग फितूरी था
इसलिए
बहुत सोचा इक
दिन
फिर से
अपने बारे में;
और जाने किस
गुबार में
अष्टाव्रक जिंदगी
के उस कोने
की सफाई करने
चला।

दिमाग ध्वस्त था
इसलिए
पसीने के
पत्थर से जब
सूखे खून के जाले
को तोड़ा, तो
नासूर सा कांटो भरा
गड्ढा
नज़र आया।
दिमाग़ भ्रष्ट था
इसलिए
वक़्त के तकाज़ों
की छड़ी से
गड्ढे
को कुरेदा;
एक  सिसकते
पुलिंदे को
रौशनी के अन्धकार
में निकाला।
दिमाग उत्सुक था
इसलिए
पुलिंदे को
सुन्न उँगलियों से फाड़ा
और
ख़्वाबों से बंधे
जर्जर
बहीखाते को
खोला।
दिमाग जज़्बाती था
इसलिए
बहिखाते में
बिखरे हुए अक्षरों
को लम्हों
के आँचल में
संजोया;
और दर्द
के शहद से
जोड़ कर अफसाना
बनाया।
दिमाग था
इसलिए
अब जिंदगी के
उस कोने
के गड्ढे में पड़े
पुलिंदे
में रखे
बहीखाते
के अक्षरों
में लिखे दूसरों
के अफसानों में
अटकी साँस लिए,
इस बियाबान में
सूखा हलक लिए
बुद्धि
सीचँ रहा हूँ।

 

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