21
Sep
17

इक घर

“मकान कई मिले , घर न बना पाए ” – मेघना
कुछ ऐैसी बात कह दी
जो दिल को छू गई,
चारदिवारियों के
इस कठोर बंजरात में
उस,
किसी,
अब
दुर्लभ होते
घर की ख्वाहिश
ज़हन में ज़हरीली
हूक मार गई।

वक्त था जब
अपने से
लगने वाले, के
मकान को, घर
बनाने की ख्वाहिश में
मशगूल हो गये; और
पता ही न चला
कब बीबी
सनम जानम,
नींव का पत्थर ले,
दूसरे के यहाँ
बैठ गयी।
चूना लगी
सूरत को धो कर जब
सुर्ख आँखों से
वीराने को ताका, तो
जिंदगी की असलियत
का फरमान आया, जिसमें
कंधों पर टिके
डगमगाते
मकान में दो मासूम
सहमे
चेहरों से
मुख़ातिब हु़आ।
दिल पर पत्थर;
चेहरे पर नकाब;
अमीरों के हमले
और
औरकुट का सैलाब
सहता,
हौंसलाये बुलन्दी में
लगा रहा;
वयस्क मासूमों को
गर्व से चुपचाप
निहारता और उनके
घर
का चौकीदार बनने
का ख्वाब
संवारता।
आज एैसे मुकाम पर हूँ
जहाँ तमन्नाओं की
लाशों
के ढेर पर बैठ,
अभी भी बेवकूफों
की तरह,
बेवजह उस
मृगतृष्णाई
घर की तलाश में
मन
चलने को तैयार है।
बस, कम्बख्त,
उम्र
का तकाज़ा है;
इंसानों की तरह
बदन भी
धोखा
दे रहा है!
सच
तो यह है कि
सीने के पत्थर,
चट्टान
बन,
कब्र-नुमा मकान
का आकार
ले चुके हैं
और यही
अब शायद,
घर
कहलायेगा।

 

Advertisements

0 Responses to “इक घर”



  1. Leave a Comment

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s


Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email.

Join 87 other followers

September 2017
M T W T F S S
« Aug   Oct »
 123
45678910
11121314151617
18192021222324
252627282930  
Advertisements

%d bloggers like this: