19
Oct
18

या शायद

मेरे वजूद पर
हमला कब हुआ, मालूम
ही न पड़ा;
या शायद,
पलक झपकी और
अँधेरा सा लगा।
थकान ने लगान वसूला
और बदन को बेचना
ही पड़ा;
या शायद,
वक्त को भी कुछ देर
अपने पलों को थामना
ही पड़ा।

कटघरे में बंद
पिपासू यादों की फौज
के किसी बहेलिए ने
सर्प-राक्षसी का
जाल फैलाया;
या शायद,
ज़हर को रोकने के लिए
नसों के फंदे को काटना
ही पड़ा।
बवंडर में बिजली की
कड़क को कान्धा दिया;
या शायद,
खुद को दाँतों से
झिंजोड़ना
ही पड़ा।
हुज्जूम के जज़ीरे
को हुंकार से बेधा;
या शायद,
आत्मा को कायनात में
बेबसी का घूँट पीना
ही पड़ा।
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