Posts Tagged ‘Family

27
Apr
19

The Colour of my Blood is Hindustani!

“Translation is not original creation – that is what one must remember. In translation, some loss is inevitable.” – Joseph Brodsky

I invariably receive some sort of a gentle grumpy communication from my non-Hindi speaking/reading subscribers about my Hindi posts. I understand and acknowledge their irritation but Hindi is my mother-tongue and every now and then, my thoughts and words flow better for me in my own language. I can’t always give a translation in English. It would become tedious. However, this is an exception and here is a translated version of my last post.

Incidentally, why don’t the ‘gentle grumpies’ ever use the comments option?

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10
Mar
19

मेरे खून का रंग है हिन्दुस्तानी!

आज
मुझे अपने सभी साथी
अन्धे नज़र आते हैं
किन्तु
अकेले में
अनगिनती, अशरीरी आँखें
मुझे निरन्तर घूरती हैं।
ऐसे लुटेरे समय में –
अपने विश्वास की पूँजी
किसे सौंपू?
– ‘विश्वास’ पृष्ठ 103, कविता संग्रह ‘क्षण घुँघरू’ से – लेखक प्रो. रमेश कुमार शर्मा
मेरे बड़े मामा और मेरे पिता घनिष्ट मित्र थे और दोनों ही के उच्च विचारों, सिद्धान्तों और व्यक्तित्व का प्रभाव मेरी ज़िन्दगी में काफ़ी रहा है।
बड़े मामा ने 15 वर्ष की आयु में 1942 के आन्दोलन में सैनिक के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई जिसके कारण उनको 59 दिन तक आगरा कोतवाली की हवालात में रखा गया और पुलिस द्वारा लगातार बर्फ की सिला पर सुलाना, उल्टा लटका देना, नाखूनों में सुई चुभोना तथा डंडों, घूंसों से अनवरत मारना जैसी कठोर शारीरिक यंत्रणाओं को सहन करना पड़ा था। दोनों कलाइयों तथा बांयें कूल्हे के जोड़ तथा दोनों टखनों के लगभग टूट जाने पर भी उन्होंने सरकारी गवाह बनना मंज़ूर नहीं किया। इस समय के बारे में गाँधीजी ने ‘हरिजन’ में एक लेख लिखा था कि इस प्रकार की यातना इस आयु में, उनकी याद में किसी बालक को नहीं दी गई।
*
पिछले दिनों, कुछ  ‘राष्ट्रवादी’ नपुंसकों से मेरी मुलाकात हुई। या कहिये कि हिन्दुत्व का ज़हरीला जाम पी कर, यह दोगले भाड़े के टट्टू, जिनकी ज़िन्दगी में सही शिक्षा, सही दिशा, सही सोच और देश के प्रति सही कर्मठता की पावन हवा कभी बही ही नहीं – मुझ से पूछताछ करने आये थे।
धमकी वाली पूछताछ!
हिन्दू हो कर भी घर के दरवाज़े पर केसरिया झंडा ना होने की पूछताछ!
मुसलमान से सब्ज़ी खरीदने की पूछताछ!
पठानी सूट पहनने की पूछताछ!
दंगों में घर और परिवार को खो जाने वाली नसीम बहिन से मिलने की पूछताछ!
भंडारे का चंदा न देने की पूछताछ!
मोदी भक्त ना होने की पूछताछ!
और कुछ जानकारी भी…..
मेरे परिजनों के बारे में जानकारी!
फिर से पिटायी होने की जानकारी!
कहीं पर काम न मिल पाने की जानकारी!
मेरे जैसे और ‘गद्दारों’ पर लगी ज़हरीली आँखों की जानकारी!
इत्यादि…….
मैंने उनसे भारतीय संविधान के अंतर्गत धारा 19 (1)(a) के बारे में पूछा, किंतु कोई जवाब नहीं मिला।
नामाकूलों को ज़रा भी भान नहीं पड़ा कि ‘मेरे जैसे और भी हैं’ वाली जानकारी से मेरे प्राणों को धैर्य की असीम संवेदना मिली। और शायद, इसी कारण मेरी आँखों में कुछ झलका होगा, क्योंकि नाली में रहने वाले यह जीव विचलित हो कर चले गए।
*
विश्वास नहीं होता कि इन मगरूर भगवा दबंगइयों को कैसे दाना डाला जा रहा है? कब तक पाला जायेगा इनको? किस-किस पर नज़र है इनकी और कौन हैं नज़र रखने वाले? क्यों हमारी रीढ़ की हड्डी इतनी कामज़ोर है? क्या अब अपनी परछाईं को भी शक की निगाह में लाना पड़ेगा?
*
मैं चौकन्ना रहता हूँ लेकिन हमेशा चौकन्ना रहना भी थका देता है। पर मैं डरता नहीं और आखिरी साँस तक इन कीड़ों के सामने सिर नहीं झुकाऊँगा।
मेरी रगों में मेरे पूर्वजों का खून है जो मेरे सिद्धान्तों को गर्म रखता है और मैं मौत से नहीं घबराता। भयादोहन मेरी फितरत में नहीं है।
पर एक हकीकत यह भी है कि दिमाग भन्ना जाता है और प्रियजनों की अत्यधिक चिंता होती है। खुद के उसूलों की वजह से किसी दूसरे पर मुसीबत आन पड़े – अच्छा नहीं लगता। बहुत बार, दिल पर पत्थर रख कर किसी सीमा की हद की दूरी तक पहुँच जाता हूँ। ऊपर से दिलजला भी हूँ।
कलेजे में हूक उठती है और बुरे ख्वाबों का मंज़र शुरू हो जाता है। समय-समय पर इन ख्वाबों में बवंडर कुछ ज़्यादा हो जाते हैं। खास कर उस वक्त जब मेरे अंदर की व्यक्तिगत ज़िन्दगी का अतीत बेकाबू हो जाता है।
*
और क्योंकि मेरा खून किसी और की रगों में भी बह रहा है या मेरी विचारधारा की विरासत और दिमागों में पनप रही है, मैं इस मशाल को सौंपने के लिये तैयार हूँ।
22
Feb
17

The Dead and the Living

“I think I had a mother once…” – Peter Pan

I feel cheated.

Natural death has disregarded me.

Once again I have lost out.

With innumerable masks resounding with hushed, unspoken and unshed tears of shrieks, I am left in this shambles not knowing what to do? Where to go? Whom to talk to? What to talk about?  Whom to relate with?

*

The living are tiring.

*

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12
Nov
16

रक्त जड़ित आँसू

मज़बूर हूँ मैं वक़्त के तकाज़े से
मरदूद नोटों के तिलिस्मी आने-जाने से,
दिलोदिमाग के अंदर की चीखें निकल नहीं रहीं
हम खफ़ा हैं खुद अपनी
हयात से.

खंज़र से ज़्यादा नुकीले शब्दों ने
ज़हन को छलनी कर दिया,
फिर हमारी धात्री ने अपना
काम करवा के
नाकामियत की
माला से सजा दिया.

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26
Mar
16

What am I?

“There is a face behind this mask, but it isn’t me. I’m no more that face than I am the muscles beneath it, or the bones beneath that.” – Steve Moore, V for Vendetta

It has been an odd mixture of experiences these past few months….but then, what is new about it?

Something was whispered, nay pointed out. An epiphany!

And, I have no idea what I am writing?

*

I was asked as to how many ‘hits/views’ I get on my posts. My answer was, “Fifteenish.”

“Every day?” came the query.

“No,” said I, “Per week and all could be flukes.”

“Dude!” (I loathe this term), sniggered the individual, “You are not a blogger!”

True.

So, what am I?

*

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17
Jan
11

Gypsy

Rise up old friend,

Rise up from the Dark,

We’d like to see you jump,

Give us that silly grin and bark.

But if, for whatever reason, you can’t,

and with your skin you have to part,

Know this, old friend,

You’re ever a part of my heart.

But for now, rise up, old friend…this may not be your hour….

Or else, in light we’ll meet again, Old friend… Next life, year or hour.

– Arjun Agnihotri

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