Posts Tagged ‘Questions

17
Nov
18

पुलिंदा

क्या करूँ

इस पुलिंदे का? 

अब कुछ समझ 

नहीं आता। 


दान कर नहीं सकता, 

कहीं छोड़ भी नहीं पाता;

हमारे ज़माने के दस्तूर 

अब वाजिब नहीं, इसलिए 

किसी के काम का भी नहीं, 

किसी की ज़रूरत भी नहीं;

बेमतलब अब सरदर्द है मेरा, 

यादों का यह पुलिंदा। 


सीमारेखाँयों के इस माहौल में 

किसी के पास वक्त ही कहाँ? 

फेसबुक के नशे में धुत, झूमते 

और सिर्फ साइबरस्पेस की 

दीवार पर धज्जियाँ चुपकाते 

जमावड़ा खुद को ही भूल चुके;

इसलिए बाँटने का तो कोई 

मोल लाजिमी भी नहीं;

बेमतलब अब बोझ है मेरा, 

यादों का यह पुलिंदा। 


हल्की-फुल्की, छोटी-मोटी, 

खट्टी-मीठी, लंबी-चौड़ी, 

भारी-भरकम, टेढ़ी-मेढ़ी, 

नई-पुरानी, रूखी-सूखी, 

रंग-बिरंगी, सोती-जगती, 

ऊँची-नीची, हँसती-रोती, 

कभी जिस्मानी कभी रुहानी;

बेमतलब का बोध है मेरा, 

यादों का यह पुलिंदा। 


दिखावटी त्योहारों, खोखले रिश्तों, 

झूठे वादों, छलावी लोगों, जोड़-तोड़ 

की उखड़ती राहों पर हर ठोकर 

से प्रभावित हो कर, किसी दूर होते 

अरण्य के गुलाबी नुक्कड़ पर, 

फाड़ कर, चिंदियाँ बना असंख्य 

बार फेंका इनको, पर कम्बख्त 

हमेशा इठला के  चहकीं कि, 

'बेहया समझा है क्या हमें? 

न छोड़ेंगी तुम्हें';

बेमतलब का सर्पदंश है मेरा, 

यादों का यह पुलिंदा। 


अब मरते तलक खत्म 

न होने वाली इन यादों

के पुलिंदे का मैं क्या करूँ? 

वश में नहीं और भस्म 

होने से पहले, चालाक 

चुलबुली, सब की सब, 

दूसरे किसी पुलिंदों में 

रिस जाती हैं;

बेमतलब की विडम्बना है मेरी, 

यादों का यह पुलिंदा! 









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19
Oct
18

या शायद

मेरे वजूद पर
हमला कब हुआ, मालूम
ही न पड़ा;
या शायद,
पलक झपकी और
अँधेरा सा लगा।
थकान ने लगान वसूला
और बदन को बेचना
ही पड़ा;
या शायद,
वक्त को भी कुछ देर
अपने पलों को थामना
ही पड़ा।

Continue reading ‘या शायद’

25
Mar
18

Just yesterday?

(1)

आज सारे कोदंडधारी राम, सबके सब,

स्वर्णमृगों के पीछे गए, और लौटे नहीं,

सारे के सारे लक्ष्मण रावण से मिल

गए, और रेखा खींची नहीं।

सारे जटायु सीताओं की रक्षा में,

अनगिनत रावणों के हाथों

शहीद हो गए कट-कट कर ध्वस्त हो गये।

शेष रह गए हैं अब

बेशुमार सम्पाती

जो सूर्य की ओर, चार वर्षों में

केवल, चार कदम चल पाये, और

सत्य पर लगे स्वर्ण के ढक्कन से

अभिभूत होकर, उसी से चिपक गए,

फिर उन्होंने अपने चमचों से

अपनी चार-कदमी उड़ान के गीत गावये।

Continue reading ‘Just yesterday?’

26
Aug
17

My 30 and others!

New Doc 2017-08-26_1

21
Jun
17

इसलिए

दिमाग फितूरी था
इसलिए
बहुत सोचा इक
दिन
फिर से
अपने बारे में;
और जाने किस
गुबार में
अष्टाव्रक जिंदगी
के उस कोने
की सफाई करने
चला।
24
Apr
17

#16

As long it serves your purpose

it’s so easy say

“I’m like this!”

Cared for and nourished

with love

you know when and where to strike,

plunder and ravage;

Continue reading ‘#16’

22
Jan
16

Quandary

“They say that there are moments that open up your life like a walnut cracked, that change your point of view so that you never look at things the same way again.” – Jodi Picoult

It has been a tough couple of months with alienated alliances manifesting and skeletons tumbling out of various proverbial cupboards! Or is it that I chose not to acknowledge these alliances and not open these cubbyholes?

“…..truth will out!” as Launcelot Gobbo said. But the truth was always known to me (was it?), so why the anguish? Is it because nobody else seems to be bothered about it?

There is a wonderful anonymous quote, “Sometimes it’s not the people who change; it’s the mask that falls off.” When this happens, does one look at the mask or the face that has been exposed? What do you do with the fallen mask? What do you do with the exposed face? Is it really an exposed face or simply another mask? Do you wait for the mask to be picked-up? Do you want the mask to be picked-up? By whom? Should the face be covered again? Whose?

Is it your mask and face? Or mine!

Continue reading ‘Quandary’




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